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Temple direction in home

Temple

ईशान एक विदिशा है अर्थात दो दिशाओं ( उत्तर- पूर्व ) से निर्मित कोण है । यह चरों कोनों में सर्वाधिक पवित्र है; अतेव इसे आराधना, साधना, विद्यार्जन, लेखन एवं साहित्यिक गतिविधियों हेतु शुभ माना गया है । यह कोण मनुष्य को बुद्धि, ज्ञान, विवेक, धैर्य तथा साहस प्रदान करके सभी कष्टों से मुक्ति दिलाता है । इतने पूजनीय कोण को सदा पावन एवं स्वच्छ अवस्था में रखा जाना चाहिए ।

जिस भवन का यह कोण दूषित रहता है, उसकी आराधना विफल हो जाती है । उस घर में रहने वालों की बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है । परिवार में प्रायः कलह का वातावरण बना रहता है । यह भी कहा गया है की ईशान कोण के दूषित होने से कन्या सन्तान की ही प्राप्ति होती है । यदि पुत्र उत्पन्न होता भी है तो वह अल्पायु या रोगी रहता है । “ईशान ” या उत्तर -पूर्व के पर्यायवाची शब्दों से इसकी प्रभावशीलता का ज्ञान होता है; जैसे -नीलकंठ, अत्युग्र, त्रिशूल, शंकर, वर्जद्न्ष्ट, अनंत, गंडमूल आदि । वेदों में ईशान कोण की बी बड़ी-बड़ी व्याख्याएं मिलती हैं ।

ईशान कोण का स्वामी अधिपति देवतता स्वयं ईश्वर है अथवा यूँ कहें की त्रिलोकीनाथ ‘शिवशंकर ‘ हैं । ‘ पशुपत ‘ इनका अस्त्र है । आद्रा नक्षत्र का विशेष प्रभाव इस विदिशा पर होता है । ईशान कोण में सेमल का वृक्ष लगाया जाना चाहिए । इस दिशा के महत्त्व के बारे में कहा गया है की इशान कोण में मात्र मुख करके शुभ ध्यान करने से अद्वितीय फल प्राप्त होते हैं, क्योंकि सभी देवी-देवता इसी दिशा में निवास करते हैं । भवन का मुख्य द्वार ईशान कोण में रखने में उसमें रहने वाले लोग धन-धान्य तथा सम्रद्धि प्राप्त करते हैं । अतः सभी प्रकार के लाभों की प्राप्ति के लिए ईशान कोणों की आराधना करनी चाहिए । अतः ईशान कोण में ही मंदिर का निर्माण करना चाहिए ।

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