Palm Reading in hindi

Palm reading in Hindi

हस्त रेखा 

।। हाथ में रेखायें ।।

हाथ में साट प्रधान रेखायें होती हैं और सात एनी रेखायें होती हैं । निम्नलिखित रेखायें प्रधान रेखायें मानी जाती हैं –

  1. शीर्ष रेखा ( Line of Head ) जो करतल के मध्य में एक सिरे से दुसरे सिरे को और जाती है ।
  2. ह्रद
  3. जीवन रेखा ( Line of Life ) जो शुक्र क्षेत्र को घेरे हुए होती है । 
  4. य रेखा ( Line of Heart ) जो अँगुलियों के मूल स्थान के निचे शीर्ष रेखा के समानान्तर चलती है ।
  5. शुक्र मुद्रिका ( Girdle of Venus ) जो ह्रदय रेखा से ऊपर होती है और अधिकतर सूर्य और शनि क्षेत्रों को घेरे हुए होती है । 
  6. स्वास्थ्य रेखा ( Line of Health ) जो बुध क्षेत्र से आरम्भ होकर हाथ में नींचे की और आती है ।
  7. सूर्य रेखा ( Line of Sun ) जो प्रायः करतल के मध्य ( जिसे मंगल स्थल – Plain of Mars कहते है ) से ऊपर बढती हुई सूर्य क्षेत्र को जाती है ।
  8. भाग्य रेखा ( Line of Fate ) जो हाथ के मध्य में होती है और मणिबंध से आरम्भ होकर शनि क्षेत्र को जाती है ।

अन्य सात रेखा 

  1. मंगल रेखा ( Line of Mars ) जो प्रथम मंगल-क्षेत्र से आरम्भ होकर जीवन रेखा के भीतरी भाग में जाती है । 
  2. वासना रेखा ( Via Lasciva ) जो स्वास्थ्य रेखा के समानान्तर होती है ।
  3. अतीन्द्रिय ज्ञान रेखा ( Line of Intuition ) जो एक अर्द्धव्र्ट के रूप में बुध क्षेत्र से चन्द्र क्षेत्र की जाती है ।
  4. विवाह रेखा ( Line of Marriage ) जो बुध क्षेत्र पर एक आड़ी रेखा के रूप में होती है ।
  5. तिन मणिबंध रेखायें ( The three bracelets ) जो मणिबंध पर होती है । 

आयु रेखा या जीवन शक्ति रेखा ही जीवन रेखा होती है । शीर्ष रेखा को मस्तक रेखा भी कहते है । भाग्य रेखा को शनि रेखा भी कहते हैं । सूर्य रेखा को प्रतिभा रेखा का नाम दिया गया ।

हिन्दू हस्त-शास्त्र के अनुसार जो इन रेखाओं के नाम है उन्हें हम उपयुक्त स्थान पर देंगे ।

शीर्ष रेखा द्वारा हाथ दो भागों में या अर्द्ध गोलों में विभाजित हो जाता है । उपरी भाग में अंगुलियाँ, ब्रहस्पति, शनि, सूर्य, बुध, और मंगल क्षेत्र होते है । यह भाग बौद्धिक और मानसिक क्षमता का प्रतिनिधित्व करता है । दूसरा भाग जो शीर्ष रेखा से नीचे हाथ के मूल स्थान तक होता है, सांसारिक रुचियों और भावनाओं का प्रतीक होता है । इन दो भागों को अपना मार्ग-दर्शक बनाकर हस्त विज्ञानं के क्षेत्र को जातक के स्वभाव की जानकारी परन्तु प्राप्त हो सकती है । इस विभाजन की और बहुत कम ध्यान दिया गया है; परन्तु यह अत्यंत महत्त्व का है और इस पर विचार न करना बहुत बढ़ी गलती होगी ।

।। हाथ की रेखाओं की विशेषतायें ।। 

रेखाओं के सम्बन्ध में नियम यह है की वे स्पष्ट सुंकित होना चाहिए । उनको न तो चौड़ी होना चाहिए न रंग पीला । उनमें टूट-फूट, द्वीप-चिन्ह और एनी किसी प्रकार की अनियमितताएं होना अशुभ होता है ।

यदि बहुत निस्तेज होती है तो सबल स्वास्थ्य की कमी होती है और न ततो स्फूर्ति होती है न निर्णय लेने की क्षमता ।

यदि रेखायें लाल वर्ण की होती हैं तो जातक उत्साही, आशावादी, स्थिर स्वभाव का और सक्रीय होती है ।

यदि रेखायें पीले रंग की हों तो जातक में पित्त-प्रक्रति प्रधान होती है और उसको जिगर-विकार की सम्भावना होती है । वह अपने आप में रमा हुआ, कम बोलने वाला और कम मिलने-जुलने वाला तथा घमंडी होता है ।

यदि रेखायें गहरे रंग की हों ( बिलकुल काली-सी ) तो जातक गंभीर और उदास्हीं होता है । वह हठधर्मी भी होता है और बदले की भावना उसके मन से कभी नहीं हटती । वह सरलता से किसी को क्षमा नहीं करता ।

रेखायें बनती रहती, घुधली पड़ती हैं और प्रायः मिट भी जाती है । हाथ की परीक्षा में इस तथ्य को अवश्य धयान में रखना चाहिय । हस्त-शास्त्री का कर्तव्य है की जातक के हाथ के अशुभ लक्षणों को देखकर उसे उसकी अनिश्क्र प्रव्रत्तियों के कारण आने वाले संकटों के सम्बन्ध से सावधान कर दे । यह जातक की इच्छा शक्ति पर निर्भर है की वह उन प्रव्रत्तियों को सुधार सकता है या नहीं । यदि अपने गत इवान में वह एसा नहीं कर सका है तो हस्त-शास्त्री उसको बता सकता है की भविष्य में भी वह एसा करने में समर्थ होगा या नहीं । हाथ की परीक्षा में केवल एक ही अशुभ लक्ष्ण देखकर निर्णय नहीं लेना चाहिए । यदि अशुभ लक्ष्ण महत्वपूर्ण हैं तो लगभग प्रत्येक प्रधान रेखा में उसका प्रभाव प्रदर्शित होगा और यह भी आवश्यक है की अंतिम निर्णय लेने से पहले दोनों हाथों की परीक्षा की जाये ।