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chandra grah

Chandr Grah Vichar

” चन्द्र पर्वत ” ” चन्द्र विचार “ छठा पर्वत चंद्रमा का माना जाता है. यह नाम इसलिए  दिया गया है, क्योकि हाथ के जिस भाग से उसकी पहिचान होती…
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Hast Rekha Gyan

इस अखिल ब्रह्माण्ड के चराचर प्राणियों में उस सर्वशक्तिमान पर्मेश्वर्र की सत्ता  व्यापक है – कोई वस्तु – अणु के अणु से लेकर सौरमंडल के विशिष्ट- से – विशिष्ट तेजपिंड तक – इस प्रकार नहीं जिसमें भगवत सत्ता न हो परन्तु महर्षि कठ ने अपने उपयुक्त वचनों में कहा है कि वह गूढ़आत्मा  सब में सामान रूप से प्रकाशित नहीं होता. उस सच्चिदानन्द की सत्ता, चेतना और आनन्द – कला सब में व्याप्त है – परन्तु प्रकाशित सामान रूप से नहीं है. प्रस्तर में उतनी ‘चेतना नहीं है जितनी व्रक्षों में और वृक्षों की अपेक्षा मनुष्य में अधिक चेतनाहै. चेतना की शास्त्रीय परिभाषा न कर सर्वबुद्धिगम्य यह परिभाषा सुगम होगी कि जितना ‘ क्रियात्मक’ व्यापक-मन या इन्द्रियों का – इस चराचर जगत में देखा जाता है – वह ‘प्राण-शक्ति’ पर आधारित होता है और उस प्राण-शक्ति का आधार ‘चेतना’ है. महर्षि चरक ने कहा है-  ‘सेन्द्रियं चेतंद्र्व्यं निरिन्द्रियमचेतनम ‘  अर्थात जिन पदार्थों में इन्द्रियां कार्य करती हैं वे चेतन है जिनमें इन्द्रियां कार्य नहीं करती वे अचेतन है. इस व्यावहारिक परिभाषा के अनुसार प्रस्तरदी निरिन्द्रिय होने से ‘अचेतन’ हुए. परन्तु वास्तव में गंभीर द्रष्टि से देखा जय तो जो मनुष्य में जितनी क्रिया है उतनी वृक्षों में नहीं -फिर भी वृक्ष बढ़ते है, उनमें कोमल अंकुर पैदा होते है, पुष्प खिलते है, फल उत्पन्न होते है, वृक्ष बड़े होते है, पुराने होते हैं और सुखकर मर जाते है.   ‘अतः संज्ञा भवन्त्येते सुख दुःख समन्विताः।’ (मनुस्म्र्ती )  प्रतिक्षण में उनमें कुछ-न-कुछ किरिया होती रहती है. उसी प्रकार भूगर्भ-विज्ञान वेत्ता हमें बताते है की यह पत्थर दस हजार वर्ष पुराना है, यह एक लाख वर्ष पुराना और यह दस लाख वर्ष पुराना.   इस द्रष्टिकोण से भी नवांश के प्रतीक ‘पनियुग्ल’ का विशेष महत्त्व है. जैसे केवल नाडी को देखने से अनुभवी बैध को सम्पूर्ण शारीर के कुपित दोषों का ( वाट, पिट, काफ के विकारों का ) ज्ञान हो जाता है; जैसे केवल हथेली की गर्मी या पीलापन ज्वर या पीलिया रोग प्रकट कर देता है, उसी प्रकार हाथ का आकर, उँगलियों के आकर, अंगुष्ठ आदि मनुष्य की पित्तवृत्ति बोद्धिक शक्ति और प्रवृत्ति का परिचय दे देते हैं. यह तर्कसम्मत सिद्धांत है, की प्रत्येक कार्य के मूल में ‘कारण’ अवश्य होता है. यदि मनुष्यों के हाथों के आकर भिन्नभिन्न हैं तो ‘कारण’ में भिन्नता नहीं? मस्तिष्क के विभिन्न भाग शारीर के विभिन्न भाग शारीर के विभिन्न अवयवों का संचालन करते हैं.  मस्तिष्क का कौन-सा भाग किस अवयव का संचालन या अधिष्ठाता है या किस अंग से सम्बन्धित है यह निम्नलिखित तालिका से स्पष्ट होगा –  सर को घुमाना   नितम्ब प्रदेश  घुटने और टखने   पैर के अंगूठे   पैर की उंगलियाँ   कंधे   कुहनियाँ  हाथ की कलाई   हाथ की उंगलियाँ  तर्जनी  अंगुष्ठ   पलक   मुख की भीतरी भाग   मुख-ओष्ठ से वेष्टित भाग   चवना   नासिका का भीतरी भाग जहाँ कंठ के भीतरी भाग से योग होता है.  कंठ ( भीतरी भाग ) जहाँ से शब्द उच्चारित किया जाता है .  नेत्र प्रान्त ( नेत्रों को घुमाकर बगल से देखना )   सर और आँखों का युगवत संचालन . …
Dreams dekhna

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अ, आ  अंक देखना – शुभ एवं विजय का प्रतीक , अंकों से बनी संख्या देखना – भाग्य विधायक प्रतीक , आँगन देखना (अपने घर का ) – अशुभ सूचक…

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