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Ekadashi vrat katha in hindi

एकादशी व्रत 26 होते हैं. क्योंकि प्रत्येक व्रत में प्रत्येक एकादशी का महत्त्व भिन्न-भिन्न होता है. तो आईये जानते हैं उन एकादशी के नाम व् महत्त्व.

ये सभी एकादशी के नाम इस प्रकार से हैं :-

1- कामदा एकादशी

2- बैशाख कृष्णा बरूथनी एकादशी

3- बैशाख शुक्ला मोहिनी एकादशी

4- ज्येष्ठ क्रष्णा अचला एकादशी

5- ज्येष्ठ शुक्ला निर्जला एकादशी

6- आषाढ़ कृष्णा योगिनी एकादशी

7- आषाढ़ शुक्ला देवशयनी एकादशी

8- श्रावण कृष्णा कामिका एकादशी

9- श्रावण शुक्ला पुत्रदा एकादशी

10- भाद्रपद कृष्णा अजा (प्रबोधिनी ) एकादशी

11- भाद्रपद शुक्ला बामन पद्मा एकादशी

12- अश्विन कृष्ण इंदिरा एकादशी

13- आश्विन शुक्ल पापांकुशा एकादशी

14- कार्तिक कृष्णा रम्भा एकादशी

15- देवोत्थान एकादशी, तुलसी विवाह एवं भीष्म पंचक

16- मार्गशीर्ष कृष्णा उत्पन्न एकादशी

17- मार्गशीर्ष शुक्ला मोक्षदा एकादशी

18- पौष कृष्णा सफला एकादशी

19- पौत्र शुक्ला पुत्रदा एकादशी माघ कृष्णा षट्तिला एकादशी

20- माघ कृष्णा षट्तिला एकादशी

21- माघ शुक्ला जया एकादशी

22- फाल्गुन कृष्णा विजया एकादशी

23- फाल्गुन शुक्ला आमल एकादशी

24- चैत्र कृष्णा पापमोचनी एकादशी

25- पद्मिनी एकादशी

26- हरीवल्लभा एकादशी

व्रत के नियम :

व्रत करने के नियम होते हैं, जिनके बिना व्रत शुद्द नहीं माने जाते :

1- व्रत करने वाले व्यक्ति को क्रोध, लोभ, मोह, आलस्य, चोरी, इर्ष्या आदि नहीं करना चाहिए. व्रती को क्षमा, दया, दान, शौच, इन्द्रिय निग्रह देव पूजा, अग्नि होत्र और संतोष से काम करना उचित और आवश्यक है.

2- व्रत के समय बार-बार जल पीना नहीं चाहिए , दिन में सोने, तम्बाकू चवाने और स्त्री सहवास करने से व्रत बिगड़ जाता है. ये सभी कार्य व्रत में कदापि ना करें.

3- जल, फल, फूल, दूध, दही, औषधि के सेवन और गुरु ( पूज्यजनों ) के वचन इनसे व्रत नहीं बिगड़ता है.

4- होमावाशष्टि खीर, सुत (भुने हुये जौ का चूर्ण ) जो, शाक ( तोरई, ककड़ी, मेथी, आदि ), गो दुग्ध, दही, घी, मूल, आम, नारंगी और कदली फल (केला ) व्रत में खाने योग्य हैं.

5- व्रत में गंध, पुष्प, माला, शुभ्र, स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए. सौभाग्यवती स्त्रियों को विष्णु धर्म के अनुसार व्रत-पूजाओं में लाल वस्त्र धारण करने चाहिए.

6- व्रत करने वाले व्यक्ति के लिए आचमन करना आवश्यक है. नहाते-धोते, खाते-पीते, सोते, छींक लेते समय और गलियों में घूमकर आने पर आदि आचमन किया हुआ हो तो भी दुबारा करना आवश्यक है. यदि जल न मिओले तो दक्षिण कर्ण का स्पर्श कर ले. हाथ के पोरुओं को बराबर करके हाथ को गौ के कान जैसा बनाकर आचमन करें.

7- अधो वायु (अपाश्वक ) के निकल जाने, रोने,क क्रोध, करने बिल्ली और चूहे से छू जाने के बाद, जोर से हंसने और झूठ बोलने पर जल स्पर्श करना आवश्यक होता है.

8- बहुत दिनों में समोप्त होने वाले व्रत का पहले संकल्प कर लिया हो तो उसमें जन्म और मरण का सुटक नहीं लगता है. वराहों में अशौच आने पर व्रत करते रहें, दान और पूजा न करें.

9- बड़े व्रतों का प्रारंभ करने पर स्त्री रजस्वला हो जाए, तो उससे भी व्रत में कोई बाधा नहीं आती है.

10- व्रत में, तीर्थयात्रा में, अध्ययन काल में तथा श्राद्ध में दुसरे का अन्न लेने से जिसका अन्न होता है, उसी को पुन्य प्राप्त होता है.

11- किसी विपत्ति, रोग अथवा यात्रा के कारण धर्म-कर्म अपने से न हों सके तो अपना प्रिनिधि बनाकर उससे कराया जा सकता है. यदि इनमें से कोई उपलब्ध न हो तो यह काम ब्राह्मण से कराया जा सकता है.