Home » Brahaspativar Vrat

Brahaspativar Vrat

Brahspatiwar vrat

।। वृहस्पतिवार व्रत करने की विधि ।।

इस दिन भगवान् विष्णु जी की पूजा होती है । दिन में एक समय ही भोजन करते हैं । पीले वस्त्र धारण करें, पीले फलों का प्रयोग करें । भोजन भी चने की दाल, पीले कपडे तथा पीले चन्दन से पूजा करनी चाहिए । पूजन के पश्चात् कथा सुननी चाहिए । इस वृत्त के करने से वृहस्पति देवता अति प्रसन्न होते हैं तथा अन्न, धन और विद्या का लाभा होता है । स्त्रियों के लिए यह व्रत अति लाभकारी है । इस व्रत में केले का पूजन होता है ।

।।वृहस्पतिवार व्रत कथा ।।

एक समय की बात है कि भारत वर्ष में एक नृपति राज्य करता था । वह बड़ा ही प्रतापी तथा दानी था । नित्य मंदिर में दर्शन करने जाता था और वह ब्राह्मण गुरु की सेवा करने वाला था । उसके दरवाजे से कोई भी निराश होकर नहीं लौटता था । प्रयेक गुरुवार को व्रत रखता एवं पूजन करता था तथा प्रतिदिन गरीबों की सहायता करता था । परन्तु यह सब उसकी रानी को अच्छा नहीं लगता था । वह न व्रत करती न किसी को दान देती थी तथा राजा से भी एसा करने को मना करती थी ।

एक समय की बात है की राजा शिकार खेलने को वन को गए हुए थे । घर पर रानी और दासी थी । उस समय गुरु वृहस्पति देव एक साधू का रूप धारण क्र राजा के दरवाजे पर भिक्षा मांगने आगे तथा भिक्षा माँगी तो रानी कहने लगी, हे साधू महाराज ! मैं इस दान पुन्य से तंग-आ गई हूँ । क्रपया अब आप एसा उपाय बताएं, जिससे सब धन नष्ट हो जाए तथा में आराम से रह सकूँ । साधू महाराज बोले-देवी ! तुम तो बड़ी विचित्र हो ।

धन से कोई दुखी नहीं होता । हाँ यदि धन अधिक है तो उसे दान-पुन्य में लगाओ । तब रानी बोली, हे साधू महाराज ! मुझे ऐसे धन से भी क्या प्रयोजन ? जिसके रख-रखाव में समय नष्ट हो । साधू ने कहा-दिवि तुम्हारी इच्छा है तो एसा ही होगा । मैं जो उपाय बताऊँ उसके अनुसार करना । ब्रहस्पतिवार के दिन अपने केशों को धोना तथा राजा से कहना ब्रहस्पतिवार के दिन हजामत बनाये तथा कपडे धोबी के यहाँ धुलने डालना । इस प्रकार सात ब्रहस्पतिवार करने से तुम्हारा सब धन नष्ट हो जायेगा । एसा कहकर साधू महाराज अंतर्ध्यान हो गये । रानी ने साधू के कहने के अनुसार एसा ही किया । तीन ब्रहस्पतिवार ही बीते थे कि उसका समस्त धन नष्ट हो गया और भोजन के लिए भी तरसने लगे व् सांसारिक भोगों से दुखी रहने लगे । तब वह राजा रानी से कहने लगा, तुम यहीं रहो, में किसी देश में जाकर कोई कार्य कर लूँ । एसा कहकर राजा किसी दूसरे देश में जा बसा । वहीँ जंगल से लकड़ी काटकर लाता और उन्हें बेचकर जीवन-यापन करता ।

इधर राजा के घर रानी और दासी भोजन न मिलने से दुखी रहने लगीं । किसी दिन भोजन मिलता, किसी दिन जल पीकर ही रह जातीं, धन सब नष्ट हो ही चुका था । राजा भी परदेश चले गए थे । एक दिन रानी दासी से कहने लगी-यहाँ पास ही के नगर में मेरी बहिन रहती है वह बड़ी धनवान है । तू उसके पास जा वह कुछ सहायता कर देगी । रानी की आगया मान दासी उसकी बहिन के पास गई । उसने देखा कि रानी की बहिन ब्रहस्पतिवार का व्रत व कथा कर रही है । दासी ने कहा-मुझे तुम्हारी बहिन ने भेजा है । कई बार कहने पर भी उसने कोई उत्तर नहीं दिया क्योकि वह वृहस्पतिवार की कथा सुन रही थी । अतः दासी लाचार होकर लौट आयी और रानी से कहने लगी तुम्हारी बहिन ने कोई उत्तर नहीं दिया । मैं निराश होकर वापिस चली आयी हूँ ।

रानी बोली, यह सब हमारे ही कर्मों का दोष है । जब बुरा समय आता है तो कोई साथ नहीं देता । इधर जब कथा समाप्त हुई, तब रानी की बहिन मिलने आयी और बोली- में ब्रहस्पतिवार का व्रत करती हूँ । इस व्रत में कथा सम्पूर्ण नहीं होती तब तक किसी से नहीं बोलते । कहो वहीँ दासी को किसलिए भेजा था ? रानी बोली-बहिन! राजा तो परदेश चले गए हैं । हमारा समस्त धन नष्ट हो गया है । कुछ सहायता के लिए दासी को भेजा था । बहिन ने कहा विष्णु भगवान सबकी मनोकामना पूर्ण करते हैं । तुम भी यह व्रत किया करो सब संकट दूर हो जायेंगे । तब रानी ने बहिन से पूछा कि बहिन व्रत कैसे करना चाहिए ? बहिन ने कहा की विष्णु भगवन की फोटो रखकर घी का दीपक जलाएं । हल्दी व् चने की दाल तथा पीले फूल से पूजा करें व कथा सुनें और व्रत करें । पीला भोजन एक समय करें । इस प्रकार करने से गुरुदेव प्रसन्न होते हैं । अन्न, धन, पुत्र देते हैं और मनोकामना पूर्ण करते हैं । रानी और दासी ने निश्चय किया कि गुरुदेव की पूजा व व्रत हम भी जरुर करेंगे ।

जब ब्रहस्पतिवार का दिन आया तो दोनों ने व्रत रखा व विष्णु भगवन का पूजन किया । अब पीला भोजन कहाँ से आये । यह सोच ही रही थी कि दो थालों में सुन्दर पीला भोजन महात्मा के रूप में गुरुदेव लेकर आए और दासी को देकर बोले, हे दासी! यह तुम्हारे तथा रानी के लिए भोजन है । तुम दोनों करना । दासी भोजन पाकर बहुत प्रसन्न हुई और रानी जी से बोली- चलो रानी जी भोजन कर लो । रानी को इस विषय में पता नहीं था । वह दासी से कहने लगी भोजन कहाँ है ? तब दासी बोली – एक महात्मा दो थालों में हम दोनों के लिए भोजन दे गया है । आओ हम दोनों साथ-साथ भोजन करेंगे ।

फिर दोनों ने गुदव को नमस्कार कर भोजन किया । अब प्रत्येक ब्रहस्पतिवार को व्रत व् विष्णु भगवान् का पूजन करने लगे । जिसके फलस्वरूप गया हुआ राज्य व् धन प्राप्त हुआ फिर वह धार्मिक कार्यों में दान-पुन्य करने लगी, जिससे उसका यश फैलने लगा ।

एक दिन रानी सोचने लगी कि राजा का पता नहीं, वे कहाँ हैं ? व् किस प्रकार हैं ? गुरुदेव से प्रार्थना की कि राजा घर वापिस आ जाएँ । उधर ब्रह्स्पतिदेव ने राजा को रात्रि में स्वप्न देकर कहा – हे राजा ! तेरी रानी तुझको याद करती है । तू अपने घर जा । राजा प्रातः काल उठा और सोचने लगा तथा अपने नगर चलने की तयारी करने लगा । गुरुदेव की क्रपा से राजा अपने नगर में आ गया । जब नगर के निकट पंहुचा तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ कि पहले से अधिक बाग़, तालाब व् मंदिर बन गए हैं । राजा के पूछने पर नगर निवासी कहने लगे – यह सब रानी और दासी के हैं । उधर जब रानी ने राजा के आने की खबर सुनी तो दासी से कहा कि राजा तो हमको गरीबी की हालत में छोड़ गए थे ।

कहीं वह हमारी आज की हालत देखकर लौट न जाएँ, इसलिए तू दरवाजे पर कड़ी हो जा और जब राजा आयें तो उन्हें साथ ले आना । महल में आने पर राजा बहुत क्रोधित हो, पूछने लगे । तुम्हें यह धन कहाँ से प्राप्त हुआ है । तब रानी बोली यह धन, राज्य हमें ब्रहस्पतिवार व्रत के प्रभाव से प्राप्त हुआ है । यह सुनकर राजा बहुत प्रभावित हुआ । उसने भी वृहस्पतिवार व्रत करने का निश्चय किया तथा हर वृहस्पतिवार के दिन व्रत रह कथा सुनता था । वृहस्पतिवार ऐसे – ही हैं, जैसे जिसके मन में कामना होती है पूर्ण करते हैं ।

जो सदभावना पूर्वक वृहस्पतिदेव का व्रत एवं कथा पढता या सुनता है अथवा दूसरों को सुनाता है, वृहस्पतिदेव उसकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं और उनकी सदैव रक्षा करते हैं । इस प्रकार जिस सच्ची भावना से रानी और राजा ने व्रत किया तथा उनकी सभी इच्छाएं पूर्ण हुई । ऐसे ही सबकी इच्छा पूर्ण हों । कथा सुनने के बाद प्रसाद ग्रहण करना चाहिए और ह्रदय से जयकारा बोलना चाहिए – बोलो ब्रहास्पतिदेव की जय ! विष्णु भगवान की जय !

।। ब्रह्स्पतिदेव की कहानी ।।

प्राचीन काल में एक ब्राह्मण रहता था । वह बहुत निर्धन था, उसके कोई सन्तान नहीं थी उसकी स्त्री मलिनता के साथ रहती थी । वह न तो स्नान करती थी न किसी देवता का पूजन करती थी । प्रातः काल उठते ही सर्वप्रथम भोजन करती, बाद में दूसरा कार्य करती थी । इससे ब्राह्मण देवता बहुत दुखी थे । वह बहुत समझाते, मगर कोई परिणाम न निकलता था । भगवान की क्रपा हुई उस ब्राह्मणी के कन्या पैदा हुई । वह कन्या शुक्लपक्ष के चंद्रमा के सामान बढ़ने लगी । बड़ी होने पर वह कन्या विष्णु भगवान का पूजन व ब्रहस्पतिवार का व्रत करने लगी । जिसके फलस्वरूप वह ब्राह्मण धन धन्य से संपन्न हो गया । कन्या रूपवान और गुणवान थी अतः उसके रूप व कार्यों को दिखकर एक राजकुमार ने उससे विवाह करने को तैयार हो गया और विधिपूर्वक उस राजकुमार के साथ विवाह कर दिया ।

कन्या के घर से विदा होते ही व्राह्मण के घर में पहले की भांति गरीबी का निवास हो गया । यहाँ तक की पेट भरने को अन्न भी नहीं रहा । अतः लचर हो दुखी ब्राह्मण अपनी पुत्री के पास गया । बेटी ने पिता की हीं अवस्था को देखकर मन का हाल पूछा, पिता ने सब हाल कह सुनाया तो कन्या ने पिता को बहुत सा धन देकर विदा किया । जिससे ब्राह्मण का कुछ समय तो सुखपूर्वक व्यतीत हुआ, परन्तु कुछ समय बाद फिर वही दशा हो गयी । ब्राह्मण फिर अपनी कन्या के यहाँ गया, तो कन्या ने कहा की पिताजी माताजी को यहाँ बुला लाइए । उन्हें ईएसआई विधि बता दूंगी, जिससे कि गरीबी से छुटकारा हो जायेगा । ब्राह्मण तुरन्त स्त्री को साथ ले, पुत्री के यहाँ पंहुचा । पुत्री ने कहा, माँ तुम प्रातः काल उठकर विष्णु भगवान् का पूजन व व्रत किया करो । सब दरिद्रता दूर हो जायेगी । अतः वह प्रत्येक ब्रहस्पतिवार को व्रत रखने लगी । इस व्रत के प्रभाव से माँ की बुद्धि ठीक हुई और वह धन धान्य से सम्पन्न हुई । बोलो ब्रह्स्पतिदेव की जय !

।। ब्रहस्पतिवार व्रत की आरती ।।

जय ब्रहस्पति देवा, ॐ जय ब्रह्स्पति देवा ।

छिन्न-छिन्न भोग लगाऊं, कदली फल मेवा ।।

ॐ जय ब्रह्स्पति देवा ।

तुम पूरण परमात्मा, तुम अन्तर्यामी ।

जगत पिता जगदीश्वर तुम सबके स्वामी ।।

ॐ जय ब्रह्स्पति देवा ।

चरणामृत निज निर्मल, सब पापक हर्ता ।

सकल मनोरथ दायक, क्रपा करो भर्ता ।।

ॐ जय ब्रह्स्पति देवा ।

तन, मन, धन अर्पण कर जो जन शरण पड़े ।

प्रभु प्रकट तब होकर तेरे द्वार खड़े ।।

ॐ जय ब्रह्स्पति देवा ।

दीन, दयाल, दया निधि, भक्तन हितकारी ।

पाप, दोष सब हर्ता, भव बंधन हारी ।।

ॐ जय ब्रह्स्पति देवा ।

सकल मनोरथ दायक, सब संशय टारी ।

विषय विकार मिटाओ संतान सुखकारी ।।

ॐ जय ब्रह्स्पति देवा ।

जो कोई आरती तुम्हारी प्रेम सहित गावे ।

ज्येष्ठानंद आनन्दकर सो निश्चय पावे ।।

ॐ जय ब्रह्स्पति देवा ।

बोलो विष्णु भगवान की जय । बोलो ब्रहास्पतिदेव की जय ।

Tags:

Leave a Reply

Your email address will not be published.