July 6, 2020

Vastu

वस्तु शस्त्र के मूलभूत सिद्धांत :-

मनुष्य एवं ब्रह्मांड की रचना पंच महाभूतों के द्वारा हुई है जो कि इस प्रकार से हैं .. 

  1- प्रथवि 

2- आकाश

 3- जल 

4- अग्नि 

5- वायु

मनुष्य जीवन मे इनका बड़ा महत्व है , इनके द्वारा हमारा शरीर करवोहइड्रेट , प्रोटीन तथा वास आदि आंतरिक तत्व प्राप्त करता है जबकि गर्मी , प्रकाश , ध्वनि एवं वायु द्वारा बाह्य शक्ति ग्रहण करता है , प्रकरती के नियमों के विरुद्ध आचरण करने से इनका संतुलन गड़बड़ा जाता है, इस असंतुलन से हमारी ऊरजाएं विभिन्न दिशा अपना लेती हैं जिससे दबाव, तनाव और अस्वस्थता पैदा होकर मस्तिष्क मे अशान्ति छा जाती है, इसी प्रकार का असंतुलन जब प्रकर्ति मे उत्पन्न होता है तो तूफान, बाढ़, अग्निकांड तथा भूकंप आदि अपना तांडव दिखाते हैं । इस लिए यह आवश्यक है कि पंच तत्वों का संतुलन बनाए रखा जाए ताकि हम सुखमय जीवन व्यतीत कर सकें ।

पंत तत्वों की पहिचान हमारे शरीर मे :- अग्नि तत्व को नेत्र द्वारा , वायु को त्वचा द्वारा तथा जल को जीवहा द्वारा अनुभव किया जा सकता है । इसी प्रकार मानव शरीर मे उपस्थित पसीना जल तत्व , मांस-मज्जा प्रथवि तत्व , जठराग्नि अग्नि तत्व तथा श्वास वायु तत्व है ।

पंच तत्व और दिशाएं :-  उत्तर-पूर्व (ईशान) का स्वामी जल है, अतः कुआं , नलकूप, पानी

टंकी या अन्य जल स्त्रोत इसी दिशा मे होना चाहिए ।

दक्षिण-पूर्व (आग्नेय) का स्वामी अग्नि है , अतः अग्नि संबंधी कार्य रसोईघर, फेक्टरी, भट्टी, या बॉयलर इस दिशा मे होना चाहिए ।

उत्तर-पश्चिम (वायव्य) दिशा का स्वामी वायु है, अतः इस दिशा मे अतिथि गृह तथा फेक्टरी मे तैयार माल का भदारण करना चाहिए ।

दक्षिण-पश्चिम (नैकर्त) दिशा का स्वामी प्रथवि है। प्रथवि सभी तत्वों मे स्थिर है, अतः इस दिशा को अपने प्रयोग के लिए सुरक्षित रखना चाहिए ।

केंद्र का स्वामी आकाश है अतः इस भाग को गतिविधि शून्य रखें या न्यूटम गतिविधियां करें।

1- पूर्व दिशा का स्वामी इन्द्र है । इस दिशा मे विष्णु , सूर्य तथा इन्द्र का निवास स्थान मन गया है।

2- पश्चिम का स्वामी वरुण है। यह विश्वकर्मा , सागर एवं नदियों के साथ ही वरुण का भी निवास स्थान है।

3- उत्तर का स्वामी कुवेर है । विशाख , स्कन्द, सोम , तथा कुवेर इसी दिशा मे निवास करते हैं ।

4- दक्षिण का स्वामी यम है। इस दिशा मे गणेश, मात्रकाएं , भूत-प्रेत और यमराज निवास करते हैं ।

5- आग्नेय कोण का स्वामी वायु है । इस दिशा मे संतकुमार, सावित्री  ओर हनुमान का निवास है।

6- नैकर्त का स्वामी राक्षस है। इस दिशा मे भद्रकाली तथा पितरगण आदि निवास करते हैं ।

7- वायव्य का स्वामी शनि है । शनि और कात्यायनी का निवास स्थान इसी दिशा मे होता है ।

8- ईशान पर शंकर का स्वामित्व है। इस दिशा मे महेश , लक्ष्मी  तथा अग्नि का निवास है।

 

पूजा स्थान के लिए ईशान को सर्वाधिक उपयुक्त माना गया है । इस लिए पूजा-स्थल का निर्माण ईशान कोण मे ही किया जाना चाहिए । इसके अलावा मूर्ति या प्रतिमा या चित्र का मुख भी दिशा विशेष मे रखने का अपना महत्व है । ब्रह्म , विष्णु, शिव, इन्द्र, सूर्य, और कार्तिकेय कि मूर्तियों का मुख पूर्व या पश्चिम मे रखना चाहिए । गणेश, कुबेर और षोडश मात्रकाओं की मूर्तियों का मुख दक्षिण दिशा मे होना उचित है। हनुमानजी की मूर्ति का मुख सदेव नैकर्त कोण मे होना चाहिए ।

 

इन सभी कि दिशा निर्धारण के पीछे वस्तु शस्त्र वैज्ञानिक तर्क प्रस्तुत करता है आराधना या साधन के समय मन मस्तिष्क को एकाग्रचित रखना आवश्यक है। यदि पूजा-स्थल ईशान कोण मे होगा तो आराधना के समय मन-मस्तिष्क को उत्तर कि ओर से प्रवाहित होने वाला चुंबकीय तरंगों द्वारा ऊर्जा ओर गति मिलेगी जो एकाग्रता तथा आत्मिक शांति के लिए आती आवश्यक है।  

मानव –जीवन से संबंध :- 

जिस तरह ज्योतिष ने मानव-जीवन मे अपना महत्वपूर्ण स्थान बना लिया हैठीक उसी तरह वस्तु विज्ञान भी अब मनुष्य-जीवन का अभिन्न अंग बनता जा रहा है। इसका कारण यह है कि मानव-जीवन का एसा कोई पहलू नहीं है जिसे वस्तु प्रभावित न करता हो । अब यह सत्य स्थापित हो रहा है कि मकानों की दिशाउसमे राखी जाने वाली वस्तुएं और उनको रखने का तरीका भी व्यक्ति का जीवन बना-बिगाड़ सकता है। वस्तु शस्त्र मनुष्य के राशि-ग्रहों से भी बहुत निकट का संबंध रखता है।  

वस्तु के अनुसार आठ दिशाएं होती हैं और प्रत्येक दिशा एक निश्चित गृह से प्रभावित होती है। यह निम्नवत सरिणी से स्पष्ट हो जाता है-

पूरव – सूर्य – ईशान – गुरु

पश्चिम – शनि – आग्नेय – शुक्र

उत्तर – बुध – नैकर्त – राहु

दक्षिण – मंगल – बायव्य – चंद्र

सूर्य – यदि भवन का प्रवेश द्वार पूर्व दिशा मे हो तो इस भवन पर सूर्य का आधिपत्य होता है। तेजस्विता सूर्य का स्वभाव है, अतः परिवार पर भी इसका प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है। परिणाम स्वरूप घर के सभी लोग श्रेष्ठ व्यक्तित्व वाले, ओजस्वी तथा स्मरद्द रहते हैं। इसे भवन के स्वामी को कड़वी वस्तुएं – मेथी, करेल आदि अधिक भाति है ।

चंद्र – यदि भवन का मुख्य द्वार वायव्य दिशा में हो तो इस भवन पर चंद्र का स्वामित्व होता है। परिवार के मुखिया का स्वभाव आती चंचल, अस्थिर तथा भवेश मे बहने वाला होता है। सैर-सपाटा और यात्रा उसे बेहद पसंद होती है। हरी सब्जियों का सेवन अच्छा लगता है। एसे लोग नमक अधिक खाते हैं।

मंगल – मंगल उस भवन का स्वामी होता है, जिसका प्रवेश द्वारा दक्षिण मे रहता है। मंगल के प्रभाव से ग्रहस्वामी साहसी, चंचल तथा निडर हो जाता है। उसके पसंदीदा भोजन मे मसलों एवं गरिष्ठ पदार्थों को अधिकता रहती है।

बुध – जिस भवन का प्रवेश द्वार उत्तर दिशा मे होता है, उसका स्वामी बुध को माना गया है। बुध अपने प्रभाव द्वारा ग्रहस्वामी के व्यक्तित्व मे बुद्दिचातुर्य एवं विनोद का समावेश करता है। एस व्यक्ति अपने बुद्धिबल पर प्रसिद्दी पाता है। उसका कार्य लेखन एवं साहित्य की अन्य विधा होता है। वह नियमितता तथा अनुशासन का कड़ाई से पालन करता है। एसे मनुष्य किसी भी खाध सामग्री को प्रधानता नहीं देते। जो भी मिल जाता है, उसे सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं।

गुरु – गुरु या ब्रहस्पति अपना आधिपत्य उस भवन पर रखता है, जिसका प्रवेश द्वार ईशान दिशा मे रहता है। एसा ग्रहस्वामी स्वभाव से दयालु, धार्मिक एवं विचारशील प्रकर्ति का होता है। आवश्यकता पड़ने पर ये साहस का संचार भी कर लेते हैं। इनकी रुचि अध्ययन, अध्यापन, भाषा तथा शिक्षा के अन्य क्षेत्रों मे होती है। ये प्रायः पवित्र एवं सात्विक भोजन ही ग्रहण करते है।

शुक्र – आग्नेय दिशा मे प्रवेश द्वार होने से भवन पर शुक्र का आधिपत्य राहत है। इस कारण घर का मुखिया विलासी तथा मौज-मस्ती करने वाला होता है। एसे लोग जीवन मे जटिल कार्यों के बीच भी मनोरंजन के लिए पर्याप्त समय निकाल लेते हैं। ये अपनी आमदनी का एक बड़ा हिस्सा एसे ही कार्यों पर व्यय करते हैं। इनकी बातचीत सिनेमा, नाटक, संगीत, अभिनय आदि पर ही केंद्रित होती है। ये स्वभावतः कला प्रेमी होते हैं। रसिक प्रवर्ति होने के कारण इनके कपड़े तड़क-भड़क वाले होते हैं। सुंदर दिखने के लिए ये अनेक उपक्रम करते हैं। इनके भोजन में दही, पनीर, कढ़ी तथा खट्टी वस्तुओं की अधिकता होती है।

शनि – शनि उस भवन का स्वामी मन जाता है जिसका मुख्य द्वार पश्चिम दिशा मे होता है। शनि के स्वभाव के परिणाम स्वरूप ग्रहस्वामी मे ठहराव, गंभीरता एवं विचारशीलता आदि का समावेश हो जाता है। एसे लोग किसी भी कार्य मे हाथ डालने से पूर्व गंभीर चिंतन करते हैं। मिलने-जुलने वाले सभी सगे-संबंधियों मे इनकी छवि गंभीर व्यक्तित्व वाली बन जाती है। ये ठंडे पेय पदार्थों तथा गरिष्ठ व तले भोजन को आठीक प्राथमिकता देते हैं।

राहू – नेकर्त दिशा में प्रवेश द्वार वाले भवन पर राहु का स्वामित्व होता है। राहु को तामसी प्रवत्ति का माना गया है, अतएव ग्रहस्वामी मूलतः तामसिक अर्थात गमंदी, लुच्चा एवं धूर्त होता है। गुस्सा करना इनकी दिनचर्या का आवश्यक भाग बन जाता है। मांस तथा बासी वस्तुएं खाना इन्हें रुचिकर लगता है।

उपरोक्त व्याख्या से यह स्पष्ट हो जाता है की कोई गृह विशेष किस प्रकार अपना प्रभाव दिखाता है। अब कई लोगों के मन में यह प्रश्न उठान स्वाभाविक है की यदि किसी भवन मे एक से अधिक प्रवेश द्वारा हों तो गृह किस प्रकार अपना असर दिखते हैं। इस प्रश्न का उत्तर यह है की यदि उस घर पर दो या तीन ग्रहों का आधिपत्य हो तो सभी सम्मिश्रित प्रभाव ग्रहस्वामी पर पड़ते हैं।

प्रवेश द्वार के अतिरिक्त खिड़कियों एवं रोशनदानों की स्थितियाँ भी अपना प्रभाव दिखती हैं। यदि व्यक्ति का शनि बाली और प्रभावी हो तथा उसके घर कसा द्वार दक्षिण दिसँ मे हो तो उसे यस, मन एवं लक्ष्मी की प्राप्ति होती है यदि शनि बलहीन और निष्प्रभावी हो तथा घर का द्वार दक्षिण दिशा मे हो तो वह अपना दुपरभव अवश्य दिखाता है ।