July 1, 2020

Know About Your Kundali

Kundali (Grahon ka prabhav )

ज्योतिषाचार्य वराहमिहिर ने सम्राट किक्रमादित्य के काल मे ही यह स्पष्ट कर दिया था की मानव-जीवन के चारों ओर गृह अपनी गति से बराबर गतिशील है । जिस क्षण विशेष में जिस स्थल पर मानव का जन्म होता है, उस समय उस स्थल पर, जिस प्रकार के ग्रहों की द्राक्षतियों का प्रभाव काम या अधिक होता है, मानव ( बालक ) का स्वभाव भी वैसा ही बन जाता है अर्थात उसमें त्रिगुणों ( सतोगुण, तमोगुण, रजोगुण ) की प्रधानता ग्रहों के फलस्वरूप ही संभव होती है।

मानव-शरीर का संचालन ग्रहों के द्वारा ही होता है। सूर्य नेत्र मे स्थिर होकर जीवमात्र को देखने की शक्ति प्रदान करता है और आमाशय मे बैठकर पाचन-क्रिया को संचालित करता है। चंद्रमा मन को प्रभावित करता है तथा जल तत्व को सम्यक रूप से नियंत्रित करता है। मंगल रक्त को शरीर मे संचालित करता है।

इसी प्रकार बुध बुद्धि तथा ह्रदय का स्वामी होकर मानव-ह्रदय को आनंद से भर देता है । गुरु मेधा शक्ति को संचालित कर ज्ञान पड़न करता है। शुक्र जिवहा तथा जननेन्द्रिय मे निवास कर हर प्रकार के रसों का रसास्वादन करता है एवं जननेन्द्रिय के समस्त भोगों को रस प्रदान करता है। उदार को चलाने का कार्य शनि राहु और केतु के द्वारा संपन्न होता है। शनि स्नायुमंडल का स्वामी है । राहु नाभि से चार अंगुली नीचे पिंडलियों मे बैठकर चलनेर की शक्ति प्रदान करता है। केतु पाचन-तंत्र तथा पैर के तलवों मे निवास करता है और मानव को चलायमान रखता है । जब ये गृह पतिकूल होते हैं तो अपने से संबंधित शरीर के अंगों मे गृह स्थिति के अनूषर दोष एवं विक्रती या जाती है। आर्यभट्ट के अनुसार ग्रहों का प्रभाव गर्भकाल से ही आरंभ हो जाता है ।

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