Mantra

मंत्र

वर्ण भेद से मन्त्रों की संज्ञा

भगवन शंकर ने रावण को बताया मन्त्रों का विवरण…  

भगवन शंकर उवाच :- हे रावण ! सुनो – वर्ण संख्या आधार पर मन्त्रों का नामकरण इस प्रकार किया गया है, यथा-एक वर्ण वाले मन्त्र को ‘कत्तरी’, दो वर्ण (अक्षरों) वाले मन्त्रों को ‘सूची’, तीन वर्ण वाले मन्त्रों को ‘मुद्गर’ , चार वर्ण वालों को ‘मुशल’ , पांच अक्षरों वालों को ‘क्रूर’ , छः अक्षरों वाले ‘श्रंखल’ तथा सात अक्षर वाले को ‘कवच’ , आठ अक्षरों वाले को ‘शूल’ , नौ अक्षरों वाले मन्त्र को ‘वज्र’ , दस अक्षरों वाले को ‘शक्ति’, ग्यारह अक्षर वाले को ‘परशु’ तथा बारह अक्षर वाले को ‘चक्र’ , तेरह अक्षर वाले को ‘कुलिश’ , चौदह अक्षर वाले को ‘नाराच’ , पंद्रह अक्षर वाले को ‘भुशुण्डी’, सोलह अक्षर वाले मंत्र को ‘पद्ध’ कहते हैं ।

मंत्रच्छेद में ‘कत्तरी’, भेद कर्म में ‘सूची’, भज्जन में ‘मुद्गर’, क्षोभण में ‘मुशल’, बंधन में ‘श्रंखल’, विद्वेषण में ‘परशु’, सभी कर्मों में ‘चक्र’, उन्माद में ‘कुलिश’, सैन्य भेद में ‘नाराच’, मारण में ‘भुशुण्डी’, तथा शांति व् पुष्टि कर्म में ‘पद्ध’, संज्ञक मन्त्रों का उपयोग करना सदैव सिद्दीदायक होता है। पचास वर्णों वाले मन्त्र मात्रका देवी से उत्पन्न त्रिलोकी के भय लो दूर करने वाला होता है । जो मानव जिस आशा से मन्त्र जप करता है , उसकी इच्छा मंत्र-जप ले ही पूर्ण होती है । मन्त्रों में जिनके आदि में नाम हों उन्हें ‘पल्लव’ मंत्र कहा जाता है । मरण, संहार, भूतादिक निवारणार्थ विद्वेषण तथा उच्चाटन आदि कर्मों में ‘पल्लव’ संज्ञक मंत्र ज्यादा उपयोगी होता है । जिस मंत्र के अंत में नाम हो उसे ‘योजन’ मंत्र कहा जाता है । पौष्टिक, शांति, वशीकरण तथा प्रायश्चित, मोहन, विशोथान और दीपन कर्मों में योजन का ही उपयोग लाभदायक होगा अन्यथा कदापि नहीं । छेदन, उच्चाटन, स्तम्भन व् विद्वेषण कर्म में भी ‘योजन’ मन्त्रों का प्रयोग उचित फलदायक होता है ।

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Author: Good luck

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