Vastu tips

vastu-tips

वास्तु का ग्रहों से सम्बन्ध :

जिस प्रकार ग्रहों की स्थिति अनुकूल अथवा प्रतिकूल होने पर मानव सुख या दुःख का भोग करता है उसी प्रकार ये गृह वास्तु को भी शुभ-अशुभ परिणामों से ग्रस्त कर देते हैं । वास्तु पर ग्रहों के प्रभाव को एक उम्दा उदाहरण द्वारा समझा जा सकता है । एक पत्थर जिस पर ग्रहों का शुभ प्रभाव है, उसका प्रयोग भगवन की मूर्ति बनाने में किया जाता है । दूसरा पत्थर जिस पर ग्रहों का अशुभ प्रभाव है, उसे कहीं सीढियों पर भी स्थान नहीं मिलता । अतः यह सिद्ध हो जाता है की ग्रहों का प्रभाव निर्जीव वस्तुओं पर भी अवश्य पड़ता है ।

वास्तु के अनुसार आठ दिशाएँ होती हैं और प्रत्येक दिशा एक निश्चित गृह से प्रभावित होती है । यह निम्नवत सरणी से स्पस्ट हो जाता है –

पूर्व – सूर्य – ईशान – गुरु

पश्चिम – शनि – अग्नेय – शुक्र

उत्तर – बुध – नैंॠत्य – राहु

दक्षिण – मंगल – वायव्य – चन्द्र

ग्रहों द्वारा गृहस्वामी तथा उसके परिवार के सदस्यों पर पड़ने वाले प्रभाव का विवरण इस प्रकार है –

सूर्य – यदि भवन का प्रवेश द्वार पूर्व दिशा में हो तो इस भवन पर सूर्य आधिपत्य होता है । तेजस्विता सूर्य का स्वभाव है, अतः परिवार पर भी इसका प्रभाव पड़ना स्वाभाविक है । परिणाम स्वरूप घर के सभी श्रेष्ठ व्यक्तित्व वाले, ओजस्वी तथा सम्रद्ध रहते हैं । ऐसे भवन दे स्वामी को कडवी वस्तुएं – मेथी, करेला, आदि अधिक बहती हैं ।

चन्द्र – यदि भवन का मुख्य द्वार वायव्य दिशा में हो तो इस भवन पर चन्द्र का स्वामित्व होता है । परिवार के मुखिया का स्वभाव अति चंचल, अस्थिर तथा भावावेश में बहने वाला होता है । सैर-सपाटा और यात्रा उसे बेहद पसंद होती है ।

हरी सव्जियों का सेवन अच्छा लगता है । इसे लोग नमक अधिक खाते हैं ।

मंगल – मंगल उस भवन का स्वामी होता है । जिसका प्रवेश द्वार दक्षिण में रहता है । मंगल के प्रभाव से गृहस्वामी साहसी, चंचल तथा निडर हो जाता है । उसके पसंदीदा भोजन में मसलों एवं गरिष्ठ पदार्थों की अधिकता रहती है ।

बुध – जिस भवन का प्रवेश द्वार उत्तर दिशा में होता है, उसका स्वामी बुध को माना गया है । बुध अपने प्रभाव द्वारा गृहस्वामी के व्यक्तित्व में बुद्धिचातुर्य एवं विनोद का समावेश करता है एसा व्यक्ति अपने बुद्धिबल पर प्रसिद्धि पाता है । उसका कार्य क्षेत्र लेखन एवं साहित्य की अन्य विधा होता है । वह नियमितता तथा अनुशासन का कड़ाई से पालन करता है । ऐसे मनुष्य किसी भी खाध सामग्री की प्रधानता नहीं देते । जी भी मिल जाता है, उसे सहर्ष स्वीकार कर लेते हैं ।

गुरु – गुरु या ब्रहस्पति अपना आधिपत्य उस भवन पर रखता है, जिसका परेश द्वार ईशान दिशा में होता है । ऐसा गृहस्वामी स्वाभाव से दयालु, धार्मिक एवं विचारशील प्रक्रति का होता है । आवश्यकता पड़ने पर ये सहस का संचार भी कर लेते हैं । इनकी रूचि अध्ययन, अध्यापन, भाषा तथा शिक्षा के अन्य क्षेत्रों में होती है । ये प्रायः पवित्र एवं सात्विक भोजन ही ग्रहण करते हैं ।

शुक्र – अग्नेय दिशा में परेश द्वार होने से भवन पर शुक्र का अधिपत्य रहता है । इस कारण घर का मुखिया विलासी तथा मौज-मस्ती करने वाला होता है इसे लोग जीवन के जटिल कार्यों के बीच भी मनोरंजन के लिए पर्याप्त समय निकाल लेते हैं । ये अपनी आमदनी का एक बड़ा हिस्सा इसे ही कार्यों पर व्यर्थ में व्यय करते हैं । ये स्वभावतः कला प्रेमी होते हैं । रसिक प्रवृति हिने के कारण इनके कपडे तडक-भडक वाले होते हैं । सुन्दर दिखने के लिए ये अनेक उपक्रम करते हैं । इनके भोजन में दही, पनीर कढ़ी तथा खट्टी वस्तुओं की अधिकता होती है ।

शनि – शनि उस भवन का स्वामी माना जाता है जिसका मुख्य द्वार पशिम दिशा में होता है शनि के स्वाभाव के परिणाम स्वरुप गृहस्वामी में ठहराव, गंभीरता एवं विचारशीलता आदि का समावेश हो जाता है । इसे लोग किसी भी कार्य में हाथ डालने से पूर्व गंभीर चिंतन करते हैं । मिलने-जुलने वाले सभी सगे-संबंधियों में इनकी छवि गंभीर व्यक्ति वाली बन जाती है । ये ठंडे पेय पदार्थों तथा गरिष्ठ व् तले भोजन को अधिक प्राथमिकता देते हैं ।

राहु – नैंॠत्य दिशा में प्रवेश द्वार वाले भवन पर राहु का स्वामित्व होता है । राहु को तामसी प्रवृति का माना गया है, अतएव गृहस्वामी मूलतः तामसिक अर्थात ग्म्न्दी, लुच्चा एवं धूर्त होता है । गुस्सा करना इनकी दिनचर्या का आवश्यक भाग बन जाता है । मांस तथा बासी वस्तुएं खाना इन्हें रुचिकर लगता है ।

उपरोक्त व्याख्या से यह स्पष्ट हो जाता है की कोई गृह विशेष किस प्रकार अपना प्रभाव दिखता है । अब कई लोगों के मन में यह प्रशन उठाना स्वाभाविक है की यदि किसी भाव में एक से अधिक परेश द्वार हों तो गृह किस प्रकार अपना असर दिखाते हैं । इस प्रशन का उत्तर यह है कि यदि उस घर पर दो या तिन ग्रहों का आधिपत्य हो तो सभी सम्मिश्रित प्रभाव गृहस्वामी पर पड़ते हैं ।

प्रवेश द्वार के अतिरिक्त खिडकियों एवं रोशनदानों की स्थितियां भी अपना प्रभाव दिखाती हैं । यदि व्यक्ति का शनि बलि और प्रभावी हो तथा उसके घर का द्वार दक्षिण दिश में हो तो उसे यश, मान एवं लक्ष्मी की प्राप्ति होती है । यदि शनि बलहीन और निष्प्रभावी हो तथा घर का द्वार दक्षिण दिशा में हो तो वह अपना कुप्रभाव अवश्य दिखता है ।

वास्तु शास्त्र के सिद्धांतों एवं नियमो का पालन करके ग्रहों द्वारा वास्तु पर पड़ने वाले कुप्रभावों से बचा जा सकता है । भवन निर्माण के दौरान दिशा विशेष में क्या बनाया जाए –

इस प्रश्न का उत्तर यह सारिणी देते है –

सूर्य – पूर्व – स्नानघर

चन्द्र – वायव्य – अतिथिगृह, अनाज भंडारगृह

मंगल – दक्षिण – रसुइघर, भंडारगृह

बुध – उत्तर – तिजोरी

गुरु – ईशान – पूजाघर, बैठक कक्ष

शुक्र – अग्नेय – रसोई घर

शनि – पशिम – अध्ययन कक्ष, बच्चों का शयन कक्ष    

राहु – नैंॠत्य – वयस्कों का शयन कक्ष

उपरोक्त सारिणी द्वारा सही दिशा में उचित कक्षों आदि का निर्माण करने पर भवन वास्तुदोषों तथा ग्रहों के कुप्रभाव से मुक्त रहता है । इसलिए जिस दिशा विशेष में जिस निर्माण का उल्लेख किया गया है, उसका पालन करना चाहिए ।

दिशा विशेष में एक राशि  विशेष अवस्थित होती है । यह राशि  भी अपना प्रभाव दिखाए बिना नहीं रहती । इसलिए किस दिशा का प्रवेश द्वार किस राशि  दे व्यक्ति पर अपना शुभ प्रभाव दिखता है, इस वास्तु शास्त्र में निचे दी गई सारिणी द्वारा स्पष्ट किया गया है –

पूर्वमेष – ईशान – कुम्भ, मिथुन

पश्चिमतुला – अग्नेय – वृष, मीन

उत्तरमकर – नैंॠत्य – सिंह, कन्या

दक्षिण – कर्क – वायव्य – वृश्चिक, धनु

उपरोक्त सारिणी का धयान रखते हुए भवन निर्माण के समय दिशा और राशि के संबंध को विशेष महत्त्व देना चाहिए । इस प्रकार किए जाने वाले निर्माण कार्य से ग्रहों की शुभ छाया गृहस्वामी तथा कुटुम्बजनो पर सदैव रहती है ।

Author: Good luck

this is an information site. you can increase your knowledge by this site.

Leave a Reply