मंत्र जप विधि

आज हम अपने साधकों को मन्त्र जप की सही विधि बताएँगे जिससे की साधक किसी भी मंत्र का जप सही विधि से करें और उसका फल प्राप्त करें .

जैसा की हम सभी जानते हैं की कई प्रकार के मंत्र होते हैं और उनके देवता भी अलग-अलग होते हैं इसी तरह से हर मंत्र की संख्या भी अलग-अलग होती है , लेकिन यदि मंत्र को करने के तरीकों को बदल दिया जाएँ तो मन्त्र में अद्वितीय शक्ति का भंडार हो जाता है , तो आज हम मन्त्र करने के तरीकों पर प्रकाश डालेंगे कि मंत्र करने के तरीके बदलने से मंत्र की शक्ति कैसे बदल जाती है.

तो आज विषय है जाप किस प्रकार के किस किस तरह फल देते है।

जप के प्रकार
वैदिक मंत्र जप करने की चार पद्धतियाँ हैं

  1. वैखरी
  2. मध्यमा
  3. पश्यंती
  4. परा

1-शुरु-शुरु में उच्च स्वर से जो जप किया जाता है, उसे वैखरी मंत्रजप कहते हैं |

2-दूसरी है मध्यमा | इसमें होंठ भी नहीं हिलते, व दूसरा कोई व्यक्ति मंत्र को सुन भी नहीं सकता |

  1. जिस जप में जिह्वा भी नहीं हिलती, हृदयपूर्वक जप होता है और जप के अर्थ में हमारा चित्त तल्लीन होता जाता है उसे पश्यंती मंत्रजाप कहते हैं |
  2. चौथी है परा | मंत्र के अर्थ में हमारी वृत्ति स्थिर होने की तैयारी हो, मंत्रजप करते-करते आनंद आने लगे तथा बुद्धि परमात्मा में स्थिर होने लगे, उसे परा मंत्रजप कहते हैं |

वैखरी जप है तो अच्छा लेकिन वैखरी से भी दस गुना ज्यादा प्रभाव मध्यमा में होता है | मध्यमा से दस गुना प्रभाव पश्यंती में तथा पश्यंती से भी दस गुना ज्यादा प्रभाव परा में होता है | इस प्रकार परा में स्थित होकर जप करें तो वैखरी का हजार गुना प्रभाव हो जायेगा |

‘याज्ञवल्क्यसंहिता’ में आता है:

उच्चैर्जप उपांशुश्च सहस्रगुण उच्यते |
मानसश्च तथोपांशोः सहस्रगुण उच्यते |
मानसश्च तथा ध्यानं सहस्रगुण उच्यते ||

परा में एक बार जप करें तो वैखरी की दस माला के बराबर हो जायेगा | दस बार जप करने से सौ माला के बराबर हो जायेगा |

• जैसे पानी की बूँद को बाष्प बनाने से उसमें 1300 गुनी ताकत आ जाती है वैसे ही मंत्र को जितनी गहराई से जपा जाता है, उसका प्रभाव उतना ही ज्यादा होता है | गहराई से जप करने से मन की चंचलता कम होती है व एकाग्रता बढ़ती है | एकाग्रता सभी सफलताओं की जननी है |

• मंत्रजाप निष्काम भाव से प्रीतिपूर्वक किया जाना चाहिए | भगवान के होकर भगवान का जप करो | ऐसा नहीं कि जप तो करें भगवान का और कामना करें संसार की | नहीं … निष्काम भाव से प्रेमपूर्वक विधिसहित जप करने वाला साधक बहुत शीघ्र अच्छा लाभ उठा सकता है |

• ईश्वर के नाम का बार-बार जप करो | चित्त को फुरसत के समय में प्रभु का नाम रटने की आदत डालें | चित्त को सदैव कुछ-न-कुछ चाहिए | चित्त खाली रहेगा तो संकल्प-विकल्प करके उपद्रव पैदा करेगा | इसलिए पूरा दिन व रात्रि को बार-बार हरिस्मरण करें | चित्त या तो हरि-स्मरण करेगा या फिर विषयों का चिंतन करेगा | इसलिए जप का ऐसा अभ्यास डाल लें कि मन परवश होकर नींद में या जाग्रत में बेकार पड़े कि तुरंत जप करने लगे | इससे मन का इधर-उधर भागना कम होगा | मन को परमात्मा के सिवाय फिर अन्य विषयों में चैन नहीं मिलेगा |

• ‘मन बार-बार अवांछनीय विचारों की ओर झुकता है और शुभ विचारों के लिए, शुभ नियम पालने के लिए दंगल करता है |’ साधक को ऐसी अनुभूति क्यों होती है ? इसका कारण है पूर्वजन्म के संस्कार और मन में भरी हुई वासना तथा संसारी लोगों का संग | इन सब दोषों को मिटाने के लिए नाम-जप, ईश-भजन के सिवाय अन्य कोई सरल उपाय नहीं है | जप मन को अनेक विचारों में से एक विचार में लाने की और एक विचार में से फिर निर्विचार में ले जानेवाली सांख्य प्रक्रिया है |

साधक का हृदय जप से ज्यों-ज्यों शुद्ध होता जायेगा, त्यों-त्यों पुस्तक के धर्म से भी अधिक निर्मल धर्म का बोध उसके हृदय में बैठा ईश्वर उससे कहेगा | जप से ही ध्यान में भी स्थिरता आती है |

जप चित्त की स्थिरता का प्रबल साधन है | जब जप में एकाग्रता सिद्ध होति है तो वह बुद्धि को स्थिर करके सन्मार्गगामिनी बनाती है |

• भगवत्कृपा व गुरुकृपा का आवाहन करके मंत्र जपना चाहिए, जिससे छोटे-मोटे विघ्न दूर रहें औ श्रद्धा का प्राकट्य हो | कभी-कभी हमारा जप बढ़ता है तो आसुरी शक्तियाँ हमें प्रेरित करके नीच कर्म करवाकर हमारी शक्तियाँ क्षीण करती हैं | कभी कलियुग भी हमें इस मार्ग से श्रेष्ठ पुरुषों से दूर करने के लिए प्रेरित करता है इसीलिए कबीरजी कहत हैं:

“संत के दर्शन दिन में कई बार करो | कई बर नहीं तो दो बार, दो बार नहीं तो सप्ताह में एक बार, सप्ताह में भी नहीं तो पाख-पाख में (15-15 दिन में) और पाख-पाख में भी न कर सको तो मास-मास में तो जरूर करो |”

 भगवद्दर्शन, संत-दर्शन विघ्नों को हटाने में मदद करता है |

• साधक को मन, वचन और कर्म से निन्दनीय आचरण से बचने का सदैव प्रयत्न करना चाहिए |

• चाहे कितनी भी विपरीत परिस्थितियाँ क्यों न आ जायें, लेकिन आप अपने मन को उद्विग्न न होने दें | समय बीत जायेगा, परिस्थितियाँ बदल जायेंगी, सुधर जायेंगी … तब जप-ध्यान करूँगा यह सोचकर अपना साधन-भजन न छोड़ें | विपरीत परिस्थिति आने पर यदि साधन-भजन में ढ़ील दी तो परिस्थितियाँ आप पर हावी हो जायेंगी | लेकिन यदि आप मजबूत रहे, साधन-भजन पर अटल रहे तो परिस्थितियों के सिर पर पैर रखकर आगे बढ़ने का सामर्थ्य आ जायेगा |

• संसार स्वप्न है या ईश्वर की लीलामात्र है, यह विचार करते रहना चाहिए | ऐसे विचार से भी परिस्थितियों का प्रभाव कम हो जाता है |

• साधक को अपने गुरु से कभी-भी, कुछ भी छिपाना नहीं चाहिए | चाहे कितना बड़ा पाप या अपराध क्यों न हो गया हो किन्तु गुरु पूछें, उसके पहले ही बता देना चाहिए | इससे हृदय शुद्ध होगा व साधना में सहायता मिलेगी |

• साधक को गुरु की आज्ञा में अपना परम कल्याण मानना चाहिए |

• शिष्य चार प्रकार के होते हैं: एक वे होते हैं जो गुरु के भावों को समझकर उसी प्रकार से सेवा, कार्य और चिंतन करने लगते हैं | दूसरे वे होते हैं जो गुरु के संकेत के अनुसार कार्य करते हैं | तीसरे वे होते हैं जो आज्ञा मिलने पर काम करते हैं और चौथे वे होते हैं जिनको गुरु कुछ कार्य बताते हैं तो ‘हाँ जी… हाँ जी…’ करते रहते हैं किन्तु काम कुछ नहीं करते | सेवा का दिखावामात्र ही करते हैं |

गुरू की सेवा साधु जाने, गुरुसेवा का मुढ पिछानै |

पहले हैं उत्तम, दूसरे हैं मध्यम, तीसरे हैं कनिष्ठ और चौथे हैं कनिष्ठतर | साधक को सदैव उत्तम सेवक बनने के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए | अन्यथा बुद्धिमान और श्रद्धालु होने पर भी साधक धोखा खा जाते हैं | उनकी जितनी यात्रा होनी चाहिए, उतनी नहीं हो पाती |

• साधक को चाहिए कि एक बार सदगुरु चुन लेने के बाद उनका त्याग न करे | गुरु बनाने से पूर्व भले दस बार विचार कर ले, किसी टोने-टोटकेवाले गुरु के चक्कर में न फँसे, बल्कि ‘श्रीगुरुगीता’ में बताये गये लक्षणों के अनुसार सदगुरु को खोज ले | किन्तु एक बार सदगुरु से दीक्षा ले ली तो फिर इधर-उधर न भटके | जैसे पतिव्रता स्त्री यदि अपने पति को छोड़कर दूसरे पति की खोज करे तो वह पतिव्रता नहीं, व्यभिचारिणी है | उसी प्रकार वह शिष्य शिष्य नहीं, जो एक बार सदगुरु बन लेने के बाद उनका त्याग कर दे | सदगुरु न बनाकर भवाटवी में भटकना अच्छा है किन्तु सदगुरु बनाकर उनका त्याग कदापि न करें |

• सदगुरु से मंत्रदीक्षा प्राप्त करके साधक क प्रतिदिन कम-से-कम 10 माला जपने का नियम रखना चाहिए | इससे उसका आध्यात्मिक पतन नहीं होगा |
जिसकी गति बिना माला के भी 24-50 माला करने की है, उसके लिए मेरा कोई आग्रह नहीं है कि माला लेकर जप करे, लेकिन नये साधक को माला लेकर आसन बैठकर 10 माला करनी चाहिए | फिर चलते-फिरते जितना भी जप हो जाय, वह अच्छा है |

• कई लोग क्या करते हैं ? कभी उनके घर में यदि शादी-विवाह या अन्य कोई बड़ा कार्य होता है तो वे अपने नियम में कटौति करते हैं | फिर 10 मालाएँ या तो जल्दी-जल्दी करते हैं या कुछ माला छोड़ देते हैं | कोई भी दूसरा कार्य आ जाने पर नियम को ही निशाना बनाते हैं | नहीं, पहले अपना नियम करें, फिर उसके बाद ही दूसरे कार्य करें |

• कोई कहता है: ‘भाई ! क्या करें ? समय ही नहीं मिलता …’ अरे भैया ! समय नहीं मिलता फिर भी भोजन तो कर लेते हो, समय नहीं मिलता फिर भी पानी तो पी लेते हो | ऐसे ही समय न मिले फिर भी नियम कर लो, तो बहुत अच्छा है |

• यदि कभी ऐसा दुर्भाग्य हो कि एक साथ बैठकर 10 मालाएँ पूरी न हो सकती हों तो एक-दो मालाएँ कर लें और बाकी की मालाएँ दोपहर की संधि में अथवा उसमें भी न कर सकें तो फिर रात्रि को सोने से पूर्व तो अवश्य ही कर लेनी चाहिए | किन्तु इतनी छूट मनमुखता के लिए नहीं, अपितु केवल आपदकाल के लिए ही है |

• वैसे तो स्नान करके जप-ध्यान करना चाहिए लेकिन यदि बुखार है, स्नान करने से स्वास्थ्य ज्यादा बिगड़ जायेगा और स्नान नहीं करेंगे तो नियम कैसे करें ? वहाँ आपदधर्म की शरण लेकर नियम कर लेना चाहिए | हाथ-पैर धोकर, कपड़े बदलकर निम्नांकित मंत्र पढ़कर अपने ऊपर जल छिड़क लें | फिर जप करें |

ॐ अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा |
यः स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्यभ्यन्तरः शुचिः ||

• ‘पवित्र हो या अपवित्र, किसी भी अवस्था में गया हुआ हो किन्तु पुण्डरीकाक्ष भगवान विष्णु का स्मरण करते ही आन्तर-बाह्य शुद्धि हो जाती है |’

• ऐसा करके नियम कर लेना चाहिए |

• ‘राम-राम… हरि ॐ … ॐ नमः शिवाय …’ आदि मंत्र हमने कई बार सुने हैं किन्तु वही मंत्र गुरुदीक्षा के दिन जब सदगुरु द्वारा मिलता है तो प्रभाव कुछ निराला ही हो जाता है | अतः अपने गुरुमंत्र को सदैव गुप्त रखना चाहिए |

• आपक गुरुमंत्र आपकी पत्नी या पति, पुत्र-पुत्री तक को पता नहीं चलना चाहिए | यदि पति-पत्नी दोनों साथ में गुरुमंत्र लेते हों तो अलग बात है, वरना अपना गुरुमंत्र गुप्त रखें | गुरुमंत्र जितना गुप्त होता है उतना ही उसका प्रभाव होता है | जिसके मनन से मन तर जाये, उसे मंत्र कहते हैं |

• साधक को चाहिए कि वह जप-ध्यान आदि दिखावे के लिए न करे अर्थात ‘मैं नाम जपता हूँ तो लोग मेरे को भक्त मानें… अच्छा मानें… मुझे देखें…’ यह भाव बिल्कुल नहीं होना चाहिए | यदि यह भाव रहा तो जप का पूरा लाभ नहीं मिल पायेगा |

• यदि कभी अचानक जप करने की इच्छा हो तो समझ लेना कि भगवान ने, सदगुरु ने जप करने की प्रेरणा दी है | अतः अहोभाव से भरकर जप करें |

• सूर्यग्रहण, चंद्रग्रहण तथा त्यौहारों पर जप करने से कई गुना लाभ होता है | अतः उन दिनों अधिक जप करना चाहिए |

• साधक को चाहिए कि वह जप का फल तुच्छ संसारी चीजों में नष्ट न करे… हीरे-मोती बेचकर कंकर-पत्थर न खरीदे | संसारी चीजें तो प्रारब्ध से, पुरुषार्थ से भी मिल जायेंगी क्योंकि जापक थोड़ा विशेष जप करता है तो उसके कार्य स्वाभाविक होने लगते हैं | ‘जो लोग पहले घृणा करते थे, अब वे ही प्रेम करने लागते हैं… जो बॉस (सेठ या साहब) पहले डाँटता रहता था, वही अब सलाह लेने लगता है…’ ऐसा सब होने लगे फिर भी साधक स्वंय ऐसा न चाहे | कभी विघ्न-बाधाएँ आयें, तब भी जप द्वारा उन्हें हटाने की चेष्टा न करे बल्कि जप के अर्थ में तल्लीन होता जाये |

• जप करते समय मन इधर-उधर जाने लगे तब हाथ-मुँह धोकर, दो-तीन आचमन लेकर तथा प्राणायाम करके मन को पुनः एकाग्र किया जा सकता है | फिर भी मन भागने लगे तो माला को रखकर खड़े हो जाओ, नाचो, कूदो, गाओ, कीर्तन करो | इससे मन वश में होने लगेगा |

• जप चाहे जो करो, जप-त-जप ही है, किन्तु जप करने में इतनी शर्त जरुरी है कि जप करते-करते खो जाओ | वहाँ आप न रहना | ‘मैं पुण्यात्मा हूँ… मैंने इतना जप किया…’ ऐसी परिच्छिन्नता नहीं अपितु ‘मैं हूँ ही नहीं…जो कुछ भी है वह परमात्मा ही है…’ इस प्रकार भावना करते-करते परमात्मा में विलीन होते जाओ |
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मेरा मुझमें कुछ नहीं, जो कुछ है सो तोर |
तेरा तुझको सौंपते क्या लागत है मोर ||

• शरीर परमात्मा का, मन परमात्मा का, अंतःकरण भी परमात्मा, तो फिर समय किसका ? समय भी तो उसीका है | ‘उसीका समय उसे दे रहे हैं…’ ऐसा सोचकर जप करना चाहिए |

• जब तक सदगुरु नहीं मिले, तब तक अपने इष्टदेव को ही गुरु मानकर उनके नाम का जप आरंभ कर दो … शुभस्य शीघ्रम् |

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